कतरा क़तरा


कतरा क़तरा मेरे ठन्डे अश्क,
कतरा क़तरा तेरी बहकी चाहत

कतरा क़तरा मेरी उलझी आहें,
कतरा क़तरा तेरी सांस की आहट

कतरा क़तरा तेरे जिस्म की खुशबू,
क़तरा क़तरा मेरे रूह के हिस्से

कतरा क़तरा मेरे लहू की रंजिश,
क़तरा क़तरा तेरे प्यार के किस्से

कतरा क़तरा तेरी यादों का मंजर,
कतरा क़तरा मेरे कफ़न से रिश्ते

कतरा क़तरा मेरे पिघलते सपने,
क़तरा क़तरा इस मौत की किश्तें

 

चलो आज चाँद की सवारी करेंगे


चलो आज चाँद की सवारी करेंगे
वक़्त के पहियों को थोड़ा मोड़ लेंगे हम

ज़रा पीछे ले जाएंगे इस सवारी को
और अपनी बगल में बचपन को बिठाएंगे

सूरज की छत के नीचे
फिर खेलेंगे जी भर के

पसीने की खुशबू में जब हम नहायेंगे
तो शिकवे जवानी के सब धुल जायेंगे

चलो आज चाँद की सवारी करेंगे
वक़्त के पहियों को थोड़ा मोड़ लेंगे हम

सितारों के दाने डालेंगे किसी कबूतर को
ख्वाबों के पंखों पे कहीं दूर उड़ जायेंगे

बादलों में बैठ कर फिर
दोस्तों से गप्पे लड़ाएंगे

चलो आज चाँद की सवारी करेंगे
वक़्त के पहियों को थोड़ा मोड़ लेंगे हम

किस्सों के मांझों को सुलझा लेंगे थोड़ा थोड़ा
पतंगें उड़ाएंगे कभी, कभी पेचे लड़ाएंगे

आसमान की छतरी छोड़ कर मेरे दोस्त
बारिशों में गुलछर्रे उड़ाएंगे

भर लेंगे जेबों में हर एक लम्हे को
हर एक कहानी फिर अपने बचपन को सुनाएंगे

चलो आज चाँद की सवारी करेंगे
वक़्त के पहियों को थोड़ा मोड़ लेंगे हम

 

सुबह


सुबह की किरण ने मेरी आँखें टटोली
कुछ अधूरे सपने अभी भी पलकों पे सो रहे थे

मेरी आँखों ने झूमते हुए बिस्तर को संभाला
उस सिराहने पर ही शायद कोई बादल बरसा था

वो चादर की सलवटें मेरे ख्यालों से रूबरू थीं
कुछ उलझी सी, बेदार सी, बेशर्म सी

फिर सोचा की आज यादों में नहायेंगे जी भर के
वो बक्से जो बंद है सदियों से उनको भी रियाही देंगे

अपनी आँखों में रख लेंगे मखमल से वो लम्हे
जिन लम्हों की छाँव में आज भी जिंदगी आसान हो जाती है

ये लफ्ज़ मेरी आस के उतरे जो कभी कागज़ पे
वो गीत बनके झूमें और अमर हो जाएँ

एक चाय की प्याली तब मेरी नींदों को दस्तक दी
लो मुर्दों का ये काफिला आज फिर से दफ्तर चल दिया

सुकून


वो ज़ंजीरें वक़्त की
ना बाँध पायी मेरी साँसों को

वो बंद दरवाज़े भी
ना मिटा सके तेरी खुशबू

कुछ लफ्ज़ छूटे थे
जो तेरे मेरे दरमियान

आज लगता है की मेरे

जिस्म को छूने आएं हैं

आँखें नाम हैं मेरी
और बातें भीग गयी हैं

एक हमशकल दिखता है मुझे
कोई वीरान शख्स है शायद

इस खुदगर्ज़ रूह के
टुकड़े पड़े हैं बिस्तर पे

तू साथ दे मेरा
तो शायद समेट लूँ इन्हे

मेरे इस मौत के बिस्तर पे
तेरी यादों का सिरहना है

तू कफ़न ओढ़ा दे अगर
में सुकून से सो जाऊंगा